प्राण क्या है

Saturday, May 10, 2008

Red Dogs


Red dos means laal kutte,it is good about to all,Red color and dogs not a good combinations,but what can we do it is the work of nature,Bitch made connections with red mate,there are fruit is Red puppy in house,when we see in the day time,that color is red and when we see in the night the color changed and that color is black,Red color is the warning color,if you see any house lord has red dog,do not make relations with him,that house lord always busy with fighting with his servants,and there you can not find single cup or tea.When Red dog has white tail and black mouth it means that dog always fill his or her stomach by the things,those theft by him,when this type dog eats hidden things and servants find punishment,then perhaps that blame you can find from there.

Monday, March 3, 2008

Pets always Helpfull in Life !

Powerful Idea to live secure !
Pets are very help full in life,when we start to live with pets it means we have some kindness in our hearts,Dog is the very best pet in our homes and also this pet give many helps in the living matters,I have a pet dog name Rocky! yaa it is the good name for him,always cooperate in the living life in my family,always he secure family members,and not want any enterfare in the life without permissions of my family members,when a new guest want to enter in my home,Rocky always indicate to family members,by the voice loud voice! "Bhau Bhau"and if any guest want to enter in the house forcely Rocky always show to family members-"Grrr Bhau",we all ready to see who is want to enter in house without permission.

Rocky not want any thing,only food!
Rocky always ready to serve his service to my family,he make keep quite when not any work for him.When some body calls him,he always welcome to him,and indicate by the flying his long tail,left right left right,when Rocky feel hungery,always makes voice like "ooook ooook" in long ways,it means that need food,when Rocky feel any type illness always want to live alone for recovery his health,in the time of cold days,he always think to live with family members for taking body heat,and in the night Rocky search for site in house,on the soft and relaible foam etc.
Prectice to hear far voices
Every time Rocky when in silence mode it means he is trying to hear far voice to make sense who is where,if any street dog want to enter in the house,he first goes him by forcely,and lazy street dogs always show him fears,first he check behind the street dog and after take reason by the sense of smell,and then he start to make sexual conectivity if that bitch,it is more interesting game always play by him.
You are welcome !
Yes if you want to call him,he always see to you like a friend,and open his moth,there are only two things he want one,want love,and second want food,Rocky can make safty himself and not allow any mistake about him self,when he start to take food,that time Rocky aleart for the saving his food,if any person,byoned of family,he always start to attack in the feeding time,so do not interfare in the feeding time.happy peting.
Posted by Picasa

Tension Always bad for body and mind !

Tension is the most powerfull reason for destroying body and mind strength,thinking for the life and also thinking for the life mate,thinking for the new income and thinking about progress of family,it is not must in continue time.When any work in hand,that time thinking is powerful and with out any work thinking is not good.When You want to sit alone in the house,or your mind not want to make conectivity with others,it means your mind is going in the side of negativity.Leave negativity and go for enjoy any type of the good amusment and see what is where,I think when we arise and always we think for the full day work,only think for the arise time work like freshing,bathing,break fast and and then think for the work.
Posted by Picasa

Thursday, August 2, 2007

चौबीस गुन

चौबीस गुण
मानव शरीर जब पृथ्वी पर अवतरित होता है तो प्रकृति चौबीस गुणों के साथ उसे विभूषित करने के बाद सजा संवार कर रखती है,कुछ गुण तो जन्म से ही होते हैं,और कुछ संसार में रह्कर उसके पास समय से आते जाते रहते हैं। िन चौबीस गुणों के नाम इस प्रकार से हैं।
१.रूप,२.रस,३.गंध,४.स्पर्श,५,संख्या,६.परिमाण,७.पृथक्त्व (अलगाव)८.संयोग,९.विभाग,१०.परत्व,११.अपरत्व,
१२।गुरुत्व,१३.द्रवत्व,१४.स्नेह,१५.शब्द,१६.बुद्धि,१७.सुख,१८.दुख,१९.इच्छा,२०.द्वेष,२१.प्रयत्न,२२.धर्म,२३.अधर्म,
२४।संस्कार.
इन गुणों के आधार पर ही मनुष्य विशेष की व्याख्या की जाती है,जब भी कोई बात किसी के प्रति चलती है,तो केवल यही कहा जाता है कि या तो वह बिलकुल बेवकूफ़ है,या कहा जाता है,कि वह सर्व गुण सम्पन्न है।कितने ही लोग इन गुणों को ही भाव समझ कर अपनी अपनी व्याख्या करते है,और ज्योतिष जैसे ग्रंथ को पढने के बाद लोग जब किसी के गुण दोष का विवेचन करते हैं,तो वहाँ पर ज्ञात होता है,कि सामने वाले व्यक्ति के अन्दर कितना क्या है.

Thursday, July 19, 2007

मौत के बाद


क्या मौत के बाद जीवन है ?
अर्जुन ने भगवान मुरली मनोहर से प्रश्न किया कि हे प्रभु ! आपका जन्म तो अभी हुआ है,और सूर्य का जन्म तो कितने ही काल पहले हुआ था,मै किस प्रकार से मानू,कि आपने ही भगवान सूर्य को योग विद्या सिखाई थी ?
भगवान मुरली मनोहर ने जबाब दिया कि - हे पार्थ! मेरे और तुम्हारे कितने ही जन्म हो चुके है,मुझे वह सब याद है,और तुम भूल गये हो,मै अजन्मा,अविनाशी,सम्पूर्ण प्राणियों का स्वामी,और अपनी ही प्रकरति से स्थित हूं,और अपनी ही माया से ही जन्मता हूं,जो मेरे इस अलौकिक रूप जन्म और कर्म का तत्व जानता है,वह मौत के बाद फ़िर जन्म नही लेता है,और मुझमे ही लीन हो जाता है
गीता संसार की सबसे प्राचीन और सर्वश्रेष्ठ ज्ञानदाता है,यह महा भारत नामक ग्रन्थ का अंश है,कब महाभारत हुई और कब गीता लिखी गई,यह सब विवाद के घेरे मे है,लेकिन हजारो साल पहले की बात जरूर मालुम होती है,गीता को संस्कार युक्त भाषा मे लिखा गया,गीता के लखने का काल तो महाभारत से भी पहले का इसलिये लगता है,कि जो बाते गीता मे लिखी है,वे महाभारत से काल मे तो थी ही नही,इसलिये लगता है कि यह बात और पहले के महाभारत काल मे लिखी गई होंगीहजारो साल पहले ही हमारे देश भारत के तपस्वियों ने और मुनियो ने ज्ञान प्राप्त कर लिया था,उनके मतानुसार आत्मा,अजर अमर,अद्रश्य,अकाट्य,हैमौत केवल चोला परिवर्तन है,जिस प्रकार से कपडे को बाला जाता है,उसी प्रकार से आत्मा शरीर को बदल देती है,इसलिये मालुम चलता है कि मौत के पहले का जीवन जान लेने की गति यहां के लोगो मे बहुत पहले से ही थी,और उनको पता होता था,कि अगला जन्म कहां और किस जीव के रूप मे होगा,इसकी एक कहानी पुराणों मे मिलती है,एक राजा ने बहुत तपस्या अपने पिछले जीवन मे की थी,और तपस्या के बाद दूसरा जीवन उसको एक राजा के घर मे मिला,राज्पुत्र होने के कारण राजगद्दी भी उसको मिली,राज भोगने के बाद उसका जब अन्त समय आया तो उसने अपने पुत्रो को बुला कर कहा कि,मेरा अन्त समय अब गया है,और अब राज्य की बागडोर तुम सबके हाथ है,साथ ही मैने राजा के रूप मे कितने ही जाने और अन्जाने पाप किये है,अगले जन्म मे मुझे एक शूद्र के घर सूअर के रूप मे जन्म होगा,मै नही चाहता हूं कि एक राजा सूअर के रूप मे भिष्टा खाये,तुम मुझे मेरे जन्म के बाद ही खत्म कर देना,मेरी पहिचान होगी कि मेरे माथे पर एक सफ़ेद गोल निशान होगा,यह निशान मेरे द्वारा लगातार चन्दन लगाये जाने के कारण ही पाप रहित होगा,कुच समय बाद राजा की मौत हो गयी और राजपुत्र अन्तिम क्रिया आदि करने के बाद उसी शूद्र के घर पर गये,और उसको आज्ञा दे कि जितने भी सूअर के बच्चे इस बीच मे पैदा हुए है,उनको लाकर दिखाओ,शूद्र ने राजा के मरने के बाद मे जन्मे सूअर के बच्चो को लाकर दिखाया,उनमे एक बच्चा मिला जिसके माथे पर राजा के बताये अनुसार सफ़ेद रंग का निशान था,राजपुत्रो ने उस बच्चे को अलग करवाया,और उस बच्चे को मारने के लिये जैसे ही हथियार चलाना चाहा,वह सूअर का बच्चा अपने सिर को हिलाकर मना करने लगा कि अब मत मारो,मै इसी काया मे खुश हूं,कारण अगर तुम अगर मुझे मार दोगे तो मुझे फिर से जन्म लेना पडेगा,और जो दुख जन्म लेने पर होता है,वह मरने पर नही होता है,उसकी बात को समझ कर वे राजपुत्र अपने महल को वापस चले गये.कहानिया बिना किसी बात के बनती नही है,मनुष्य के मन मे जो आता है,वह किसी किसी रूप मे होता जरूर है,जैसे अपने इसी काल को देखें,लोगो का मन था कि लोग एक दूसरे से दूर बैठ कर बात करे,टेलीफोन बन गया,फिर लोगो की इच्छा हुई कि बिना तार का टेलीफोन हो जिससे जहां जाऊं वही से बात हो जाये,और मोबाइल बन गया,फिर मन मे आया कि बात भी करूं,और शक्ल भी देखूं,वीडिओफोन बन गया,इसी तरह से जो आदमी मन मे लाता है वह किसी किसी रूप मे होता जरूर है,मगर उस होने मे अन्तर कितना है,इसी बात का ज्ञान नही है

जीवन और मृत्यु


प्राण क्या है?
जिस अन्न को हम खाते है,वह पेट मे चला जाता है,वहां पर नाभि मे रहने वाली जठराग्नि उस खाये हुए अन्न को दुबारा से पकाती है,चन्द घंटो के अन्दर उस अन्न का स्थूल भाग मल मूत्र से बाहर चला जाता है,उसका वास्तविक तत्व भीतर ही रह जाता है,उसी जठराग्नि के द्वारा वह शक्ति के रूप मे बदल जाता है,और प्राण बाही स्त्रोतों के द्वारा शरीर के सारे अन्गो मे प्रवाहित होता रहता है,साधारण लोग प्राण का अर्थ वायु से लेते है,माना जाता है कि हवा हमारे जीवन के लिये सबसे अधिक आवश्यक है,इसलिये हम अगर उसको प्राण के नाम से पुकारने लगे तो कोई बुराई नही है,लेकिन प्राण उस शक्ति का नाम है,जो जीवन देती है,इसी को जीवनी शक्ति कहते हैं । सिर के पीछे के भाग मे मेडुलाआबलम्बगेटा नामक भाग से सुष्म्ना नामक नाडी निकलती है,और पीछे से रीढ की हड्डी के बीच से होती हुई गुदा मार्ग तक जाती है,इस बीच मे रीढ की हड्डी के जितने जोइन्ट है,सभी को सिर से प्राप्त सन्देशों को देना और और सम्बन्धित भाग से सन्देश प्राप्त करने के बाद सिर को भेजना,इस नाडी का मुख्य काम माना जाता है,लेकिन शरीर मे अपने द्वारा जब प्रक्रति से विपरीत वस्तुओ का भोजन करने से या आहार विहार करने से उस प्रक्रति को खराब कर लेते हैं,तो यह सुष्म्ना अपना काम करने मे उसी आहार विहार के अनुसार अनुशरण चालू कर देती है,और जो कभी समाज मे अच्छा जाना जाता था,उसे लोग बुरा कहना चालू कर देते है,इसी नाडी को सुरति,कुन्डलिनी,शक्ति,और आद्याशक्ति,प्राण शक्ति आदि नामो से पुकारा जाता है ।यह जीवन शक्ति ब्रहमाण्ड से नीचे उतरती है,तो सिर मे अपना फ़ैलाव माथे और चोटी के अलावा भी कितने ही स्थानो की तरफ़ करती है,पौराणिक कथाओ और मह्रिषियों के अनुसार इनकी सन्ख्या बहत्तर लाख बताई है,इन बहत्तर लाख मे तीन इनकी मुख्य नाडी है,पहली इडा,दूसरी पिन्गला,तीसरी सुषुम्ना । ये ही तीनो आपस मे गुंथी हुई मेडुलाआबलम्बगेटा से अपना स्थान बताते हुई,गुदा मर्ग तक उतर जाती है,गुदा मार्ग के पास इन तीनो ने मिलकर अपनी शक्ल एक ग्रन्थि के आकार की बना ली है,यही से इनका बहाव रुक जाता है और इनमे से छोटी छोटी नशे पावों की तरफ़ चली जाती हैं । साधारण रूप मे प्राण का बहाव इडा और पिन्गला मे रहता है,मगर योग की साधना करने पर कुन्डलिनी की धार सुषुम्ना के अन्दर आजाती है,पिन्गला मे प्राण जाने पर जिसे साधारण भाषा मे सूर्य नाडी कहते है और नाक के दाहिने भाग मे बहने वाली हवा के प्रभाव को परख कर किया जाता है,के द्वारा ह्रदय मे और शरीर की इन्द्रियो मे रजोगुण का प्रभाव पैदा हो जाता है,और इडा का प्रभाव जो कि चन्द्र नाडी का माना जाता है के द्वारा ह्रदय और इन्द्रियो मे तमोगुणी प्रभाव पैदा हो जाता है । इडा नाडी का रंग नीला है, और "र" इसका बीज अक्षर है,वाहन मेढा है,प्रधान तत्व आग है,आग हवा से मिलकर र अक्षर का उच्चारण करता है,यह चक्र त्रिकोण मे है और ड से फ़ तक वर्ण माला के दस अक्षर निकलते है,यहां के चैतन्य भगवान विष्णु और शक्ति वैष्ण्वी का निवास होता है । माया क चौथा ठहराव लिंग मे है,इसे ही स्वाधिष्ठान चक्र कहते है,इसका रंग गुलाबी है,और बनावट आधे चन्द्रमा के आकार की है,बीज अक्षर "ब" है,वाहन "मगर" है और तत्व जल है,रंग चन्द्रमा की तरह से सफ़ेद है,इसके दलो से ब से लेकर ल तक के अक्षर सुनाई देते है,इस चक्र के मालिक ब्रहमा और देवी ब्रहणी है,संसार की उतपत्ति यही से मानी जाती है । शरीर मे पांचवा चक्र गुदा और लिन्ग के बीच मे है,इस चक्र का प्रधान तत्व भूमि है,रंग मटमैला है,इसमे चार दल हैं,इसलिये ही यह मूलाधार कहलाता है,इसका बीज अक्षर "ल" है,वाहन हाथी है,अक्षर ब से लेकर स तक ही अक्षरो की ध्वनि सुनाई देती है,यहां के देवता श्री गणेशजी है,और देवी डाकिनी है,छठा चक्र दोनो भ्रकुटी के बीच है,इसका नाम आज्ञा चक्र है,यह आधा स्थूल है और आधा सूक्ष्म,इसका रूप सफ़ेद तारे की तरह से है,गोल है,ऊपर और नीचे दो दल है,जिसमे ह और क्ष दो अक्षर निकलते हैं,यही वह खिडकी है जिसमे से होकर जीवात्मा शरीर मे उतरती है,हठ योग मे इस स्थान से औम शब्द का निकलना मानते हैं,अभ्यास करने पर यहां घन्टे की ध्वनि सुनाई देती है,इसके बाद और आवाजें जिनमे परा,पश्यन्ती,मध्यमा,और वैखरी मुख्य है सुनाई देती हैं,परा संकेत होती है,पश्यन्ती ह्रदय की आवाज होती है,जो सूक्षम रूप से विचार की शक्ल मे भीतर से ही उठती है,मध्यमा कन्ठ मे अपना रूप धारण कर शब्द का सूक्षम रूप बनाती है,और वैखरी जीभ पर स्थूल शब्द का निरमाण कर बाहर जगत मे प्रकट हो जाती है,जिस प्रकार से किसी पके फ़ल को जोर से दबाने पर उसका बीज छिटक कर बाहर दूर चला जाता है,उसी प्रकार से आत्मा पर माया का भारी बोझ पडते ही जीव बाहर चला जाता है,और किसी दूसरी जगह पर अपने पिछले कर्मो के अनुसार प्राप्त होने वाली जगह पर नया जीवन लेता है,केवल छिलका हाथ मे रह जाने का तात्पर्य है मरी हुई देह का रह जाना,इसी जन्म लेने और मरने के बीच का नाम ही जीवन है,इस जीवन मे जो भी पडाव आते है,वे ही अनुभव होते हैं,और जो अनुभवो के आधार पर कहा सुना जाता है,वह भी काल,स्थान,और प्रभाव के द्वारा ही सत्यता पर खरा उतरता है,इसी के द्वारा भदावरी ज्योतिष मे जो बखान किया जाता है वह केवल काल गणना के आधार पर और स्थान विशेष के आधार पर ही कहा जाता है,ज्योतिष मे जीव ही गुरु है,और सूर्य आत्मा है,शनि कर्म है,शनि के बाद मे जो भी ग्रह बैठता है वही कर्म को बताता है ।